ब्यूरो रिपोर्ट-सुरेश सिंह
कौशाम्बी : जिले का महेवाघाट थाना आज भले ही अपने नए भवन से पुलिसिंग की जिम्मेदारी संभाल रहा हो, लेकिन इसके पुराने भवन की दीवारों में पुलिस व्यवस्था के लंबे इतिहास की कई यादें आज भी दर्ज हैं। महेवाघाट थाना बनने से पहले यहां पश्चिम शरीरा थाने की रिपोर्टिंग पुलिस चौकी संचालित होती थी। यह चौकी महेवाघाट पुल के बगल स्थित एक धर्मशाला के भवन में चलती थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक धर्मशाला में चौकी की शुरुआत करीब वर्ष 1975 से 1980 के बीच हुई थी। हालांकि इसके स्थापना वर्ष का कोई स्पष्ट अभिलेख स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार सचिदानंद मिश्रा बताते हैं कि उस समय यह चौकी पश्चिम शरीरा थाने के अधीन रहकर क्षेत्र में पुलिसिंग का काम करती थी। क्षेत्र में बढ़ते अपराध और कानून व्यवस्था को देखते हुए इस चौकी को पूर्ण थाने में उच्चीकृत करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
जर्जर होने पर नये भवन में स्थानांतरित किया गया...
वर्ष 2009 में महेवाघाट को पूर्ण पुलिस थाने के रूप में स्थापित किए जाने की स्वीकृति मिली। शासन की ओर से थाने के संचालन के लिए अस्थायी पद स्वीकृत किए गए, जिन्हें अगस्त 2015 में स्थायी कर दिया गया। इसके बाद महेवाघाट थाना पूर्ण रूप से अस्तित्व में आया। बाद में धर्मशाला के पुराने भवन से थाना हटाकर नए पुलिस भवन में स्थानांतरित कर दिया गया। वर्तमान में महेवाघाट थाना इसी नए भवन से पुलिसिंग की जिम्मेदारी निभा रहा है।
जर्जर भवन आज भी समेटे है पुरानी यादें...
महेवाघाट पुल के पास स्थित पुराना धर्मशाला भवन आज जर्जर हालत में है। हालांकि भवन की मजबूती के कारण कुछ पुलिसकर्मी आज भी इसके हिस्से में रहते हैं। पुराने भवन की दीवारें, सलाखें, रसोई, पुलिस बोर्ड और परिसर में खड़े पुराने वाहन इस बात की गवाही देते नजर आते हैं कि कभी यहीं से क्षेत्र की कानून व्यवस्था संचालित होती थी। कभी इसी भवन से अपराधियों की धरपकड़, मुकदमों की कार्यवाही और लोगों की शिकायतों का निस्तारण होता था।
दीवारों पर आज भी दर्ज है पुलिसिंग का इतिहास...
कई पुलिस अधिकारी और थानाध्यक्ष यहां अपनी सेवाएं देकर आगे बढ़े। समय के साथ थाना नए भवन में पहुंच गया, लेकिन पुराना भवन आज भी महेवाघाट की पुलिसिंग के इतिहास का जीवंत दस्तावेज बना हुआ है।
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