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तिलका मांझी ने लड़ी थीं सबसे पहले स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई, अंग्रेजों ने दिया सरेआम फांसी की सजा...

ब्यूरो रिपोर्ट-सुरेश सिंह

लखनऊ : भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जान गवां कर स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ी थी, ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी थे तिलका मांझी जिनका जन्म जन्म 11 फ़रवरी साल 1750 को बिहार के सुल्तानगंज में एक तिलकपुर नाम के गांव में हुआ था जिन्हें अंग्रेजों ने 13 जनवरी 1785 को फांसी पर लटका दिया था, लिलका मांझी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के पहले शहीद माने जाते हैं, इन्होंने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध एक लम्बी लड़ाई छेड़ी थी, संथालों द्वारा किये गए प्रसिद्ध संथाल विद्रोह का नेतृत्त्व भी तिलका मांझी ने किया था, तिलका मांझी का नाम देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्रामी और शहीद के रूप में लिया जाता है अंग्रेज़ी शासन की बर्बरता के जघन्य कार्यों के विरुद्ध उन्होंने जोरदार तरीके से आवाज़ उठायी थी इस वीर स्वतंत्रता सेनानी को 1785 में गिरफ़्तार कर लिया गया और फिर 13 जनवरी को सरेआम फांसी पर लटका दिया, जानकारी के लिए आपको बताते चलें कि तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज में तिलकपुर नामक एक गाव के संथाल परिवार में हुआ था, इनके पिता का नाम सुंदरा मुर्मू था तिलका मांझी को जाबरा पहाड़िया के नाम से भी जाना जाता था ।

बचपन से ही तिलका मांझी जंगली सभ्यता की छाया में धनुष बाण चलाते और जंगली जानवरों का शिकार करते थे साथ ही कसरत कुश्ती करना, बड़े बड़े वृक्षों पर चढ़ना उतरना, बीहड़ जंगलों, नदियों, भयानक जानवरों से छेड़खानी, घाटियों में घूमना आदि उनका रोजमर्रा का काम था जंगली जीवन ने उन्हें निडर और वीर बना दिया था, बताया जाता है कि उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत तेजी से देश दुनिया पर अपना वर्चस्व कायम कर रही थी उसी दौर में तिलका मांझी किशोर जीवन से ही अपने परिवार तथा जाति पर उन्होंने अंग्रेज़ी सत्ता का अत्याचार देखा था, ब्रितानी अनाचार देखकर उनका रक्त खौल उठता और अंग्रेज़ी सत्ता से टक्कर लेने के लिए उनके मस्तिष्क में विद्रोह की लहर पैदा हो जाती थी, ग़रीब आदिवासियों की भूमि, खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेज़ी शासक अपना अधिकार किये हुए थे जंगली आदिवासियों के बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों को अंग्रेज़ कई प्रकार से प्रताड़ित करते थे आदिवासियों के पर्वतीय अंचल में पहाड़ी जनजाति का शासन था ।

वहां पर बसे हुए पर्वतीय सरदार भी अपनी भूमि, खेती की रक्षा के लिए अंग्रेज़ी सरकार से लड़ते थे, पहाड़ों के इर्द गिर्द बसे हुए ज़मींदार अंग्रेज़ी सरकार को धन के लालच में खुश किये हुए थे आदिवासियों और पर्वतीय सरदारों की लड़ाई रह रहकर अंग्रेज़ी सत्ता से हो जाती थी और पर्वतीय ज़मींदार वर्ग अंग्रेज़ी सत्ता का खुलकर साथ देता था लेकिन तिलकामांझी के विद्रोह ने पूरी रूपरेखा बदल दी थी उसे दौर में अंग्रेजों के बड़े-बड़े अधिकारी तिलकामांझी के नाम से थर्रा गए थे जिन्होंने तिलका मांझी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का फरमान जारी कर दिया इसके बाद अंग्रेजों की फौज द्वारा उन्हें पकड़ कर सरेआम घसीटते हुए फांसी दे दी गई ।

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