ब्यूरो रिपोर्ट-सुरेश सिंह
पंजाब : पंजाब के मुक्तसर साहिब में स्थित गुरुद्वारा दातनसर साहिब न केवल सिख इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्थल है। बल्कि यह गुरु गोबिंद सिंह जी की अदम्य साहस और विश्वासघात की एक दर्दनाक घटना का गवाह भी है। यहां से कुछ दूरी पर बनी एक पुरानी कब्र, जिसे मुगल जासूस नूरदीन की कब्र कहा जाता है, आज भी श्रद्धालुओं के गुस्से का शिकार बनती है। हर साल हजारों सिख श्रद्धालु यहां आकर इस कब्र पर जूते-चप्पलों से पांच-पांच बार प्रहार करते हैं – एक प्रथा जो सदियों से चली आ रही है और मुगल साम्राज्य के छल-कपट की याद दिलाती है। यह घटना 1705 के आसपास की बताई जा रही है जब मुगल सेना और गुरु गोबिंद सिंह जी के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था। मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश पर, सरहिंद के नवाब वजीर खान ने गुरु जी को हराने की कोशिश की, लेकिन युद्ध के मैदान में सिख सेना की वीरता के आगे मुगल बार-बार असफल हो रहे थे। इतिहासकारों के अनुसार, मुगलों को लगता था कि सीधे युद्ध में गुरु जी को हराना असंभव है, इसलिए उन्होंने छल का सहारा लिया। एक मुगल सैनिक नूरदीन को सिख सैनिक के भेष में गुरु जी की सेना में घुसपैठ करने का आदेश दिया गया। नूरदीन ने सिख वेशभूषा धारण की और गुरु जी के शिविर में शामिल हो गया।
उस समय गुरु गोबिंद सिंह जी चमकौर की लड़ाई के बाद मुक्तसर की ओर जा रहे थे। एक सुबह, जब गुरु जी दातुन (दांत साफ करने की लकड़ी) कर रहे थे, नूरदीन ने पीछे से तलवार से हमला कर दिया। गुरु जी के पास उस वक्त पानी का लोटा था, जिसे उन्होंने तुरंत उठाकर नूरदीन के सिर पर दे मारा। इतने जोरदार प्रहार से नूरदीन की मौके पर ही मौत हो गई। गुरु जी की यह त्वरित प्रतिक्रिया न केवल उनकी शारीरिक चुस्ती का प्रमाण थी, बल्कि दिव्य शक्ति का भी प्रतीक मानी जाती है। इस घटना के बाद, गुरु जी ने घोषणा की कि नूरदीन का विश्वासघात हमेशा याद रखा जाएगा और यहां आने वाले श्रद्धालु उसकी कब्र पर जूते मारकर अपना विरोध जताएंगे। आज गुरुद्वारा दातनसर साहिब उस स्थान पर बना है जहां यह घटना घटी। गुरुद्वारा में गुरु ग्रंथ साहिब की स्थापना है और यहां हर साल माघी के मेले में लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। कब्र गुरुद्वारे से थोड़ी दूरी पर है, और प्रथा के अनुसार, लोग यहां आकर पांच बार जूते मारते हैं – यह नूरदीन के विश्वासघात के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध है। कुछ इतिहासकार इसे मुगल अत्याचारों की याद के रूप में देखते हैं, जबकि सिख समुदाय इसे गुरु जी की रक्षा के लिए एक सबक मानता है।
यह प्रथा आज भी जीवित है। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि श्रद्धालु कब्र पर जूते मारते हुए नारे लगाते हैं। मुक्तसर साहिब के स्थानीय निवासी बताते हैं कि यह न केवल इतिहास को जीवित रखता है, बल्कि युवा पीढ़ी को विश्वासघात के खिलाफ सतर्क रहने की शिक्षा देता है। हालांकि, कुछ आलोचक इसे हिंसक प्रथा कहते हैं, लेकिन सिख विद्वान इसे प्रतीकात्मक मानते हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन संघर्ष और त्याग से भरा था। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की और मुगलों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। मुक्तसर की लड़ाई में 40 मुक्तों ने शहादत दी, जिसे आज माघी के रूप में मनाया जाता है। दातनसर की यह घटना सिख इतिहास का एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण अध्याय है, जो बताता है कि सच्चाई और विश्वासघात के बीच की लड़ाई कभी खत्म नहीं होती।
आज के समय में, जब धार्मिक स्थलों पर पर्यटन बढ़ रहा है, गुरुद्वारा दातनसर साहिब एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। पंजाब सरकार यहां विकास कार्य कर रही है, ताकि अधिक लोग इस इतिहास से जुड़ सकें। लेकिन सवाल उठता है क्या ऐसी प्रथाएं आधुनिक समाज में जारी रहनी चाहिए? सिख समुदाय का कहना है कि यह इतिहास की रक्षा है, न कि हिंसा का प्रचार। मुक्तसर साहिब की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि वीरता की जड़ें कितनी गहरी हैं।
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