ब्यूरो रिपोर्ट-सुरेश सिंह
मुम्बई : कभी-कभी कुदरत कुछ लोगों को असाधारण गुणों से नवाजती है, और स्वर्गीय प्रवीण कुमार सोबती इसका सशक्त उदाहरण थे। 6 दिसंबर 1947 को जन्मे और 7 फरवरी 2022 को इस दुनिया को अलविदा कहने वाले प्रवीण कुमार सोबती ने अपने जीवन में खेल, अभिनय और राजनीति—तीनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय पहचान बनाई। महज 18 वर्ष की उम्र में ही छह फीट सात इंच की लंबाई और मजबूत कद-काठी के कारण उन्होंने खेल जगत में कदम रखा। उन्होंने हैमर थ्रो और डिस्कस थ्रो जैसे खेलों में कड़ी मेहनत के साथ अभ्यास शुरू किया। उनकी दिनचर्या बेहद अनुशासित थी—वे रोज सुबह तीन बजे उठकर अभ्यास करते और सूर्योदय से पहले ही अपनी ट्रेनिंग पूरी कर लेते थे। इसके बाद देसी खानपान जैसे घी, दूध और दही उनके शरीर को मजबूती देते थे।
लगातार मेहनत के दम पर वे जल्द ही एक शक्तिशाली एथलीट बन गए। स्कूल स्तर से शुरू हुआ उनका सफर जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें BSF में नौकरी मिली, जहां उन्हें खेलों में आगे बढ़ने का पूरा अवसर मिला। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रवीण कुमार सोबती ने भारत का नाम रोशन किया। उन्होंने एशियाई खेलों में 2 स्वर्ण सहित कुल 4 पदक जीते। इसके अलावा 1968 और 1972 के ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1966 के कॉमनवेल्थ खेलों में उन्होंने डिस्कस थ्रो में सिल्वर मेडल भी अपने नाम किया।
खेलों में शानदार करियर के बाद उन्होंने अभिनय की दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बनाई। बी.आर. चोपड़ा की प्रसिद्ध टीवी सीरीज ‘महाभारत’ में भीम का किरदार निभाकर वे घर-घर में लोकप्रिय हो गए। इसके अलावा उन्होंने राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। प्रवीण कुमार सोबती का जीवन आज के युवाओं के लिए प्रेरणा है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि अनुशासन, कड़ी मेहनत और समर्पण से किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल की जा सकती है।
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