ब्यूरो रिपोर्ट-सुरेश सिंह
प्रयागराज : जनपद में संगम की रेती पर लगने वाले माघ मेला 2026 को लेकर साधु-संतों में असंतोष दिखाई देने लगा है। मेला क्षेत्र में व्यवस्थाओं को लेकर संतों ने खुलकर सवाल उठाए हैं और प्रशासन के रवैये को ढुलमुल बताया है। माघ मेले को लेकर प्रदेश सरकार भले ही बड़े स्तर पर तैयारियों का दावा कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आ रही है। माघ मेले में पहुंचे मूवी राजेंद्र तिवारी बाबा ने मेला प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन हमेशा से ही लापरवाही और ढीले रवैये के लिए जाना जाता रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि माघ मेले में आने वाले कल्पवासियों और साधु-संतों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो और उन्हें सभी मूलभूत सुविधाएं समय पर उपलब्ध कराई जाएं, इसके बावजूद मेला प्रशासन उन निर्देशों को गंभीरता से लागू नहीं कर रहा है। राजेंद्र तिवारी बाबा ने बताया कि अभी तक मेला क्षेत्र में न तो पीने के पानी की समुचित व्यवस्था हो पाई है और न ही आवागमन के लिए सड़कों की हालत संतोषजनक है।
कई स्थानों पर कीचड़ और असमान रास्तों के कारण साधु-संतों और श्रद्धालुओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते व्यवस्थाओं में सुधार नहीं हुआ तो माघ मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने सातवां बाबा की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से ही कुछ हद तक संतों को राहत और सहायता मिल पा रही है। यदि उनका सहयोग न होता तो साधु-संतों की समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं होता। भूमि आवंटन को लेकर संतों को बार-बार प्रदर्शन करना पड़ रहा है, जो प्रशासन की उदासीनता को दर्शाता है।
इस दौरान बाबा राजेंद्र तिवारी ने सनातन धर्म पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान समय में पूरे देश में केवल एक ही ऐसे संत हैं, जो सच्चे अर्थों में संत शिरोमणि कहलाने योग्य हैं, वह हैं श्री प्रेमानंद महाराज जी। उन्होंने कहा कि श्री प्रेमानंद महाराज जैसा संत और गुरु मिलना इस धरती पर अत्यंत दुर्लभ है और उनका मार्गदर्शन समाज के लिए अमूल्य है।
इस मौके पर धर्मेंद्र उर्फ मनी बाबा भी उपस्थित रहे। संतों ने प्रशासन से मांग की कि माघ मेला 2026 की व्यवस्थाओं को लेकर तत्काल ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि साधु-संतों और श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो और मेला अपनी आध्यात्मिक गरिमा के अनुरूप सफलतापूर्वक आयोजित किया जा सके।
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