ब्यूरो रिपोर्ट-सुरेश सिंह
लखनऊ : इस दौर के डिजिटल युग में भले ही कीबोर्ड और टचस्क्रीन ने लेखन के तरीके बदल दिए हों, लेकिन एक साधारण पेंसिल की क्षमता आज भी लोगों को हैरान कर देती है। जानकारी के अनुसार, एक औसत पेंसिल में इतना ग्रेफाइट होता है कि उससे लगभग 56 किलोमीटर (35 मील) लंबी रेखा खींची जा सकती है या करीब 45,000 शब्द लिखे जा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़ा पेंसिल के प्रकार, उपयोग के तरीके और दबाव पर निर्भर करता है, इसलिए इसमें थोड़ा अंतर संभव है। आमतौर पर एक पेंसिल से 56 से 61 किलोमीटर तक रेखा खींची जा सकती है और 45,000 से 50,000 शब्दों तक लेखन संभव है। अक्सर लोग पेंसिल की नोक को “लेड” कहते हैं, लेकिन वास्तव में इसमें ग्रेफाइट और मिट्टी का मिश्रण होता है। यही मिश्रण पेंसिल को अलग-अलग कठोरता और गहराई देता है।
16वीं सदी से शुरू हुआ पेंसिल का सफर...
पेंसिल का इतिहास करीब 16वीं सदी से शुरू होता है। वर्ष 1564 में इंग्लैंड के कंबरलैंड में शुद्ध ग्रेफाइट की खोज हुई, जिसे शुरुआत में सीसा समझा गया। इसके बाद 1560 के दशक में इतालवी कारीगरों ने लकड़ी के भीतर ग्रेफाइट रखकर पहली पेंसिल तैयार की। आधुनिक पेंसिल का स्वरूप वर्ष 1795 में फ्रांस के वैज्ञानिक निकोलस-जैक्स कोंटे ने विकसित किया। उन्होंने ग्रेफाइट पाउडर और मिट्टी को मिलाकर उसे जलाने की तकनीक अपनाई, जिससे आज की पेंसिल की “लीड” तैयार हुई।
19वीं सदी में हुआ पेंसिल का विकास...
बाद में 19वीं सदी में पेंसिल के दूसरे सिरे पर इरेज़र (रबर) जोड़ा गया, जिससे इसकी उपयोगिता और बढ़ गई।
आज भी पेंसिल को एक पर्यावरण-अनुकूल और किफायती लेखन माध्यम माना जाता है। साधारण दिखने वाली यह वस्तु अपनी उपयोगिता और क्षमता के कारण सदियों से मानव जीवन का अहम हिस्सा बनी हुई है।
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