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काजू गांव में चलता था अंग्रेजों का नील कारखाना, अवशेष बयां कर रहे गुलामी की कहानी...

ब्यूरो रिपोर्ट-सुरेश सिंह 

कौशाम्बी : चायल तहसील क्षेत्र के ग्राम पंचायत काजू के मजऱा हौसीपर गांव में आज भी ब्रिटिश काल के नील कारखाने के अवशेष मौजूद हैं, जो अंग्रेजी हुकूमत के दौर में किसानों पर हुए अत्याचार और शोषण की दास्तां को बयां कर रहे हैं। गांव के बाहर स्थित इस प्राचीन स्थल पर बनी टंकियां (हौज), कुआं और जर्जर ईंटों की दीवारें उस दौर की कड़वी सच्चाई को उजागर करती हैं। जानकारों के अनुसार, आजादी से पहले यहां अंग्रेजों का नील कारखाना संचालित होता था, जहां गरीब किसानों से जबरन नील की खेती कराई जाती थी। अंग्रेज अफसरों द्वारा किसानों को ‘तिनकठिया प्रथा’ के तहत मजबूर किया जाता था कि वे अपनी उपजाऊ जमीन का एक हिस्सा नील की खेती के लिए दें। इस व्यवस्था के चलते किसानों को खाद्यान्न उत्पादन छोड़ना पड़ता था, जिससे भुखमरी और कर्ज की समस्या बढ़ जाती थी।

स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक, उस समय अंग्रेज अधिकारी बड़े घोड़ों पर सवार होकर यहां आते थे और उनकी निगरानी में बैलगाड़ियों के जरिए तैयार नील को मनौरी रेलवे स्टेशन तक पहुंचाया जाता था। उन्होंने बताया कि उस दौर में अंग्रेज अफसरों और उनके सहयोगी जमींदारों द्वारा किसानों को मजदूर बनाकर उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। यहां तक कि आसपास के गांवों में भी उनका दबदबा और उत्पीड़न जारी रहता था। कारखाने में नील तैयार करने की प्रक्रिया भी बेहद कठिन और खतरनाक थी। पत्तियों को पानी में सड़ाकर और रासायनिक प्रक्रिया से नीला रंग निकाला जाता था, जिसमें मजदूरों को भारी जोखिम उठाना पड़ता था। वर्तमान में यहां केवल एक पुराना कुआं और नील दबाने की टूटी-फूटी टंकियां ही बची हैं।

जबकि कभी यहां एक बड़ी कोठी और ऊंची चिमनी हुआ करती थी, जो अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है। इतिहासकारों के अनुसार, 19वीं सदी में नील की खेती अंग्रेजों के लिए लाभ का बड़ा साधन थी, लेकिन किसानों के लिए यह शोषण का प्रतीक बन गई। सन 1859 में बंगाल में शुरू हुआ नील विद्रोह और 1917 में गांधी जी का चंपारण सत्याग्रह इसी अत्याचार के खिलाफ बड़े आंदोलन थे जिनके बाद इस प्रथा का अंत हुआ। लेकिन हौसी गांव का यह स्थल आज भी ‘हौसी गोदाम’ के नाम से जाना जाता है। वहीं नई पीढ़ी इसके इतिहास से अनभिज्ञ है स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि इस ऐतिहासिक स्थल का संरक्षण किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस कड़वे इतिहास से रूबरू होते रहे।


काजू गांव मूरतगंज ब्लाक अंतर्गत आने वाली एक विकसित ग्राम पंचायत है। यह क्षेत्र अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत शिव बाबा की मंदिर के लिए भी जाना जाता है। यहाँ हर रविवार और बुधवार को साप्ताहिक बाज़ार लगता है यह चरवा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है। 

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