रिपोर्ट-फैजी जाफरी
कौशाम्बी जनपद के मंझनपुर तहसील अंतर्गत बारा विकास खंड की सोंधिया (सोधिया) ग्राम पंचायत में स्थित ब्रिटिश कालीन ऐतिहासिक बहुस्तरीय पुल आज भी इंजीनियरिंग के कमाल का अनुपम उदाहरण बना हुआ है। यह पुल न सिर्फ अपनी अनोखी तीन-स्तरीय संरचना के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि व्यापार, पर्यटन और स्थानीय आजीविका को नई गति प्रदान कर रहा है। इस पुल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक साथ तीन काम कर रहा है। सबसे निचले स्तर से किलनहाई नदी का जल प्रवाहित होता है, उसके ठीक ऊपर किशुनपुर-एकडला नहर (किशुनपुर पंप कैनाल) गुजरती है और नहर के ऊपर पक्की सड़क का निर्माण किया गया है। इस सड़क के माध्यम से आसपास के गांव सीधे नगर पंचायत सराय अकिल से जुड़ते हैं, जिससे लोगों का आवागमन बेहद सुगम हो गया है। नहर के पानी में आज तक कोई रिसाव नहीं हुआ है, जो ब्रिटिश इंजीनियरिंग की मजबूती को दर्शाता है। ब्रिटिश काल की इंजीनियरिंग का गवाह लगभग 124 वर्ष पुराना यह पुल सन 1900 के आसपास ब्रिटिश हुकूमत द्वारा बनवाया गया था। उस समय हरिद्वार से रामगंगा नहर की एक शाखा के रूप में यह नहर प्रणाली विकसित की गई थी, जिसका मकसद मंझनपुर और चायल तहसील के खेतों तक सिंचाई का पानी पहुंचाना था आज यह किशुनपुर पंप कैनाल के रूप में संचालित हो रही है।
नहर पर नियंत्रण रखने के लिए अंग्रेजों ने पास ही नगरेहा में एक कोठी (निरीक्षण भवन) भी बनवाया था जो आज भी सिंचाई विभाग के संरक्षण में मौजूद है। उस दौर में पुल पर सख्त नियम थे नहर की पटरी पर जूता पहनकर चलने पर 100 कोड़े की सजा का प्रावधान था। लगान न चुकाने वाले किसानों को क्रोधित ब्रिटिश मजिस्ट्रेट द्वारा पुल से नदी में फेंकने की भी दर्दनाक घटनाएं स्थानीय बुजुर्गों की यादों में आज भी ताजा हैं। पहले यह इलाका असामाजिक गतिविधियों के लिए जाना जाता था, लेकिन पुल की प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और ऐतिहासिक महत्व ने इसे पर्यटन स्थल में बदल दिया है। दूर-दराज से लोग यहां पिकनिक मनाने, सैर-सपाटा करने और फोटो खिंचवाने आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि आसपास के जिलों में ऐसा बहुस्तरीय पुल दुर्लभ है। व्यापारिक दृष्टि से भी यह पुल महत्वपूर्ण बन गया है। आसपास के गांवों के किसान, व्यापारी और दैनिक यात्री इस सड़क का लगातार उपयोग करते हैं। इससे न केवल आवागमन आसान हुआ है, बल्कि स्थानीय उत्पादों की खपत बढ़ी है और कई परिवारों की आजीविका मजबूत हुई है।
सिंचाई विभाग इसकी नियमित देखरेख करता है लेकिन स्थानीय निवासी सरकार से बेहतर संरक्षण और पर्यटन विकास की मांग कर रहे हैं। 70 वर्षीय कल्लू (सोंधिया गांव) जैसे बुजुर्ग बताते हैं, बड़े-बुजुर्गों से सुनते आए हैं कि यह पुल सिर्फ आवागमन का साधन नहीं, बल्कि हमारे इतिहास की जीती-जागती मिसाल है। यह पुल न सिर्फ कौशाम्बी की धरोहर है, बल्कि ब्रिटिश काल की इंजीनियरिंग का प्रमाण भी। यदि सरकार इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित करे तो यह क्षेत्र आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से और समृद्ध हो सकता है।
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