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जानिए गुरु प्रदोष व्रत की कथा, इसी व्रत के प्रभाव से देवराज इन्द्र को पुनः प्राप्त हुआ था स्वर्ग लोक...

रिपोर्ट-न्यूज़ एजेंसी 

लखनऊ : हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार त्रयोदशी तिथि में सायंकाल को प्रदोष काल कहा जाता है प्रदोष व्रत को मंगलकारी एवं शिव की कृपा दिलाने वाला माना गया है गुरु प्रदोष त्रयोदशी व्रत करने वाले को 100 गायें दान करने का फल प्राप्त होता है तथा यह सभी प्रकार के कष्ट और पापों को नष्ट करता है, गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं का विनाश करने वाला भी माना गया है श्री सूतजी के अनुसार यह अति श्रेष्ठ शत्रु विनाशक भक्ति प्रिय सर्वोत्तम व्रत है, प्रदोष व्रत और प्रदोषम व्रत एक प्रसिद्ध हिन्दू व्रत है जो कि भगवान शिव का आर्शीवाद पाने के लिए किया जाता है प्रदोष व्रत प्रत्येक महीने में दो बार आता है, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में यह व्रत दोनों पक्षों के त्रयोदशी के दिन मनाया जाता है ।

प्रदोष व्रत अगर सोमवार के दिन आता है तो उसे सोम प्रदोषम कहा जाता है मंगलवार के दिन आता है तो उसे भौम प्रदोषम कहा जाता है और शनिवार के दिन आता है तो उसे शनि प्रदोषम कहा जाता है यह व्रत सूर्यास्त के समय पर निर्भर करता है, प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा शाम के समय सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक होती हैं, प्रदोष व्रत से पूर्व ता​मसिक वस्तुओं का सेवन बंद कर दें द्वादशी को शाकाहारी भोजन करें, त्रयोदशी यानी प्रदोष व्रत के प्रात: स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनें, फिर हाथ में जल, अक्षत् एवं फूल लेकर व्रत एवं पूजा का संकल्प करें, दिन में आप दैनिक पूजन कर लें और फलाहार करते हुए व्रत रखें, शाम के समय में प्रदोष मुहूर्त में किसी शिव मंदिर में जाएं या फिर घर पर ही शिवलिंग की पूजा करें, सबसे पहले गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक करें, उसके बाद शिव जी का श्रृंगार करें महादेव को सफेद चंदन, शहद, फूल, अक्षत, धूप, दीप, गंध, बेलपत्र, भांग, मदार पुष्प, धतूरा आदि चढ़ाएं, पूजा की सामग्री चढ़ाते समय ओम नम:​ शिवाय का जाप करते रहें इसके पश्चात शिव चालीसा, शिव मंत्र का जाप करें फिर गुरु प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें, पूजा के अंत में भगवान शिव की आरती करके क्षमा प्रार्थना करें और मनोकामना व्यक्त कर दें, उसके बाद प्रसाद वितरण करें किसी ब्राह्मण को अन्न, फल, मिठाई दानकर कुछ दक्षिणा देकर विदा करें उसके पश्चात पारण करके व्रत को पूरा करें ।

इस व्रत कथा के अनुसार एक बार इंद्र और वृत्तासुर की सेना में घनघोर युद्ध हुआ देवताओं ने दैत्य सेना को पराजित कर नष्ट भ्रष्ट कर डाला, यह देख वृत्तासुर अत्यंत क्रोधित हो स्वयं युद्ध को उद्यत हुआ अपनी आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण कर लिया, यह देख सभी देवता भयभीत होकर गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहूंच गये, तब गुरु बृहस्पति महाराज बोले पहले मैं तुम्हें वृत्तासुर का वास्तविक परिचय दे देता हूं वृत्तासुर बड़ा तपस्वी और कर्मनिष्ठ है उसने गंधमादन पर्वत पर घोर तपस्या कर शिवजी को प्रसन्न किया है पूर्व समय में वह चित्ररथ नाम का राजा था, एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया, वहां शिवजी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख वह उपहासपूर्वक बोला हे प्रभो मोह माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं किंतु देवलोक में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि स्त्री आलिंगनबद्ध हो सभा में बैठे, चित्ररथ के यह वचन सुनकर सर्वव्यापी शिवशंकर हंसकर बोले हे राजन मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण पृथक है मैंने मृत्युदाता कालकूट महाविष का पान किया है, फिर भी तुम साधारणजन की भांति मेरा उपहास उड़ाते हो, जिसके बाद माता पार्वती भी क्रोधित हो गई और चित्ररथ को संबोधित करते हुए बोली अरे दुष्ट तूने सर्वव्यापी महेश्‍वर के साथ मेरा भी उपहास उड़ाया है अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि तब फिर काभी महादेव का उपहास करने का दुस्साहस नहीं करेगा ।

अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर जायेगा मैं तुझे शाप देती हूं, जगदम्बा भवानी के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हुआ और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न होकर वृत्तासुर नाम का राक्षस बन गया, गुरुदेव बृहस्पति आगे बोले कि वृत्तासुर बाल्यकाल से ही शिवभक्त रहा है अत हे इंद्र तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत करके शंकर भगवान को प्रसन्न करो, देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर बृहस्पति प्रदोष व्रत किया, गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इंद्र ने शीघ्र ही वृत्तासुर पर विजय प्राप्त कर लिया, इस उपाय के फल से देवलोक में शांति छा गई उन्हें स्वर्ग लोक पुनः प्राप्त हो गया अत: प्रदोष व्रत हर शिव भक्त को अवश्य करना चाहिए ।

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