ब्यूरो रिपोर्ट-सुरेश सिंह
लखनऊ : लोकसभा चुनाव 2019 में जीत हासिल करने के बाद से पांच साल तक घर बैठने और सिर्फ मोदी-योगी के सहारे चुनाव जीतने के सपने देखते रहे नेताओं के परिणाम से पता लग रहा है कि भाजपा को लगातार दो बार सत्ता की बुलंदी तक पहुंचाने वाला यूपी एक बार फिर से 'गेमचेंजर' साबित हुआ है। बतादें कि सपा-कांग्रेस के गठबंधन ने भाजपा और उसके सहयोगी दलों के विजय रथ को यूपी की कुल 80 सीटों में आधे से भी कम पर रोक दिया। मिशन 80 का दावा करने वाली भाजपा महज 33 सीटों पर सिमट गई। इसके चलते ही भाजपा अपने दम पर पूर्ण बहुमत का जादुई आंकड़ा हासिल नहीं कर सकी। ऐसे में सवाल है कि 2014 और 2019 में पीएम मोदी को सत्ता तक पहुंचाने वाले यूपी में बीजेपी इस बार कैसे हार गई। दरअसल जिन सांसदों के खिलाफ माहौल होने के आधार पर संगठन की ओर से टिकट बदलने की रिपोर्ट हाईकमान को भेजी गई थी ।
उनमें अधिकांश सांसदों के बारे में यही कहा जाता रहा कि चुनाव जीतने के बाद पांच साल तक जनता के बीच से गायब रहेने पर क्षेत्र से इनका जुड़ाव जनता से नहीं रहा। ऐसे तमाम सांसद पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ के भरोसे बैठे रहे। माना जाता है कि भाजपा के रणनीतिकारों ने सांसदों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर जनता के बीच उभरे असंतोष को समझे बगैर मैदान में उतरने की वजह से सात केंद्रीय मंत्रियों समेत कुल 26 मौजूदा सांसदों को सीट गंवानी पड़ी जबकि भाजपा ने अपने 63 में से 48 मौजूदा सांसदों को 2024 के चुनावी मैदान में उतारा था ।
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