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सपा कार्यालय पर मनाई गई महान संतों की जयंती, सैकड़ों कार्यकर्ता रहे मौजूद...

ब्यूरो रिपोर्ट-सुरेश सिंह 


प्रयागराज : जनपद के टैगोर टाउन स्थित समाजवादी पार्टी के जिला कार्यालय पर गुरुवार को संत शिरोमणि रविदास जी एवं वारकरी संत नरहरि सोनार की जयंती श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने दोनों संतों के चित्रों पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया तथा उनके विचारों को आत्मसात करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ समाजवादी पार्टी नेता शिवशंकर वर्मा ने संत रविदास जी और संत नरहरि सोनार के जीवन एवं विचारों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दोनों संतों ने समाज में व्याप्त भेदभाव, छुआछूत और असमानता के विरुद्ध संघर्ष किया तथा समता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संतों के विचार आज भी सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने की प्रेरणा देते हैं। इस अवसर पर राकेश कुमार वर्मा, महानगर अध्यक्ष पिछड़ा मोर्चा ने कहा कि समाजवादी पार्टी हमेशा संतों और महापुरुषों के आदर्शों पर चलकर शोषित, वंचित और पिछड़े वर्गों की आवाज को मजबूती से उठाती रही है। संत रविदास और संत नरहरि सोनार का जीवन कर्म, भक्ति और समानता का जीवंत उदाहरण है।

कार्यक्रम में उपस्थित अन्य वक्ताओं ने भी दोनों संतों के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि उनके बताए मार्ग पर चलकर ही एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित समाज की स्थापना संभव है। जयंती समारोह के दौरान आपसी भाईचारे, सामाजिक एकता और संविधान में निहित मूल्यों को मजबूत करने का आह्वान किया गया।
इस मौके पर नीरज वर्मा, गौरव वर्मा, विपिन वर्मा सहित समाजवादी पार्टी के अनेक पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन संतों के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने और सामाजिक न्याय के संघर्ष को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ हुआ।

अब जानिए कौन है संत नरहरि...

भारतीय संत परंपरा में सामाजिक समरसता, भक्ति और मानव समानता का संदेश देने वाले महान संतों में संत रविदास और संत नरहरि सोनार का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। दोनों संतों ने अपने-अपने समय में समाज में व्याप्त भेदभाव, आडंबर और धार्मिक कट्टरता का विरोध करते हुए प्रेम, भक्ति और एकता का मार्ग दिखाया। संत नरहरि सोनार महाराष्ट्र के प्रसिद्ध वारकरी संत थे। 12वीं-13वीं शताब्दी में जन्मे संत नरहरि पेशे से सोनार (सुनार) थे और प्रारंभ में कट्टर शिवभक्त माने जाते थे। किंतु पंढरपुर में भगवान विट्ठल के साक्षात दर्शन के बाद उनके भीतर शिव और विष्णु की एकता का भाव जागृत हुआ। उन्होंने ‘हरि-हर अभेद’ का संदेश दिया और अपने अभंगों के माध्यम से यह बताया कि ईश्वर एक है, केवल रूप अलग-अलग हैं। मराठी भाषा में रचित उनके अभंग आज भी वारकरी संप्रदाय में श्रद्धा से गाए जाते हैं। संत नामदेव सहित कई संतों ने उन्हें महान भक्त और समाज सुधारक के रूप में स्वीकार किया।

भक्ती काल के महान संत हैं कवि रविदास...

वहीं दूसरी ओर संत रविदास 15वीं-16वीं शताब्दी के महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उनका जन्म वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में हुआ था। उन्होंने जाति-पाति, ऊंच-नीच और बाह्य आडंबरों का कड़ा विरोध किया। मन चंगा तो कठौती में गंगा जैसे वचनों के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति मन की शुद्धता और कर्म की पवित्रता में निहित है। संत रविदास ने ‘बेगमपुरा’ नामक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की, जहां न कोई दुख हो, न भेदभाव और न ही भय। संत रविदास के 41 भजन सिख धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं, जो उनके आध्यात्मिक प्रभाव और सार्वभौमिक संदेश को दर्शाते हैं। वे मीराबाई के गुरु भी माने जाते हैं।

दोनों संतों का जीवन आज के समाज के लिए प्रेरणास्रोत है। जहां संत नरहरि ने धार्मिक एकता का संदेश दिया, वहीं संत रविदास ने सामाजिक समानता और मानव गरिमा की आवाज़ बुलंद की। इन संतों की शिक्षाएं आज भी समाज को जोड़ने और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।

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